Biography of Arvind Ghosh

अरविन्द घोष ज़ी का जीवन परिचय <<<

    अरविन्द घोष या श्री अरविन्द एक महान योगी एवं दार्शनिक थे। वे 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में जन्मे थे। इनके पिता एक डाक्टर थे। इन्होंने युवा अवस्था में स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारी के रूप में भाग लिया, किन्तु बाद में यह एक योगी बन गये और इन्होंने पांडिचेरी में एक आश्रम स्थापित किया। वेद, उपनिषद ग्रन्थों आदि पर टीका लिखी। योग साधना पर मौलिक ग्रन्थ लिखे। उनका पूरे विश्व में दर्शन शास्त्र पर बहुत प्रभाव रहा है और उनकी साधना पद्धति के अनुयायी सब देशों में पाये जाते हैं। यह कवि भी थे और गुरु भी।

बंगाल क्रांतिकारियों का केंद्र बन चुका था इनके प्रमुख थे अरविंद घोष उनके घर के बगीचे में बम बनाने का कारखाना था वहीं अन्य शास्त्र भी इकट्ठटे किए जाते कि । और देश भर में पहुंचाए जाते कि। सरकार को इसका पता चल गया । अरविंद घोष बाबू के साथ अनेक क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया । उन पर मुकदमा चला। नरेंद्र गोस्वामी नाम के एक युवक ने धोखा दिया । वह सरकारी गवाह बन गया । उसको इस देशद्रोही की सजा देने का निश्चय किया गया । नरेंद्र गोस्वामी को जेल में कड़े पहरे में रखा गया तो । कन्हाई लाल दत्त नाम का एक क्रांतिकारी भी जेल में ही तो । उसको यह काम सौंपा गया । वह बहुत कम आयु का था । उसने तरकीब से नरेंद्र से मिलने का रास्ता निकाल लिया । नरेंद्र जेल के अस्पताल में तो । कन्हाई लाल दत्त को बहुत तेज बुखार था अस्पताल में नरेंद्र से मिलते हैं कन्हाई लाल दत्त ने उसके सीने में गोली मार दी ।जिलाधिकारी दंग रह गए कि जेल में पिस्तौल कहां से आई क्रांतिकारी युवक निर्भीक और साहसी था । इस प्रकार देशद्रोही को सजा मिल गई और अरविंद घोष तथा अन्य क्रांतिकारी फांसी की सजा से बच गये।

प्रारंभिक जीवन <<<

    अरविंद के पिता का नाम कृष्णधन घोष और माता का नाम स्वर्णलता था। अरविन्द घोष एक प्रभावशाली वंश से सम्बन्ध रखते थे। राज नारायण बोस, बंगाली साहित्य के एक जाने माने नेता, श्री अरविंद के नाना थे। अरविंद घोष ना केवल आध्यात्मिक प्रकृति के धनी थे बल्कि उनकी उच्च साहित्यिक क्षमता उनकी माँ की शैली की थी। उनके पिता एक डॉक्टर थे। जब अरविन्द घोष पांच साल के थे उन्हें दार्जिलिंग के लोरेटो कान्वेंट स्कूल में भेज दिया गया। दो साल के बाद 1879 में अरविन्द घोष को उनके भाई के साथ उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया।

    अरविन्द ने अपनी पढाई लंदन के सेंट पॉल से पूरी की। वर्ष 1890 में 18 साल की उम्र में अरविन्द को कैंब्रिज में प्रवेश मिल गया। यहाँ पर उन्होंने स्वयं को यूरोपीय क्लासिक्स के एक छात्र के रूप में प्रतिष्ठित किया। अपने पिता की इच्छा का पालन करने के लिए, उन्होंने कैम्ब्रिज में रहते हुए आईसीएस के लिए आवेदन भी दिया। उन्होंने 1890 में पूरे विश्वास के साथ भारतीय सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की। हांलांकि वह घुड़सवारी के एक आवश्यक इम्तेहान में खरे उतरने में विफल रहे और इसलिए उन्हें भारत सरकार की सिविल सेवा में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली।

    1902 में अहमदाबाद के कांग्रेस सत्र में अरविन्द बाल गंगा तिलक से मिले जहां वो वास्तव में उनकी अद्भुत और क्रांतिकारी व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए। बाल गंगाघर तिलक से प्रभावित होकर वो भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़ गये। 1916 में वो दुबारा कांग्रेस से जुड़ गये और ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये आक्रामक राष्ट्रवाद के लिये लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल के साथ एक मुख्य समर्थक बन गये। उन्होंने लोगों से आगे बढ़कर स्वतंत्रता के लिये बलिदान देने का आग्रह किया। उन्होंने अंग्रेजों से कोई मदद और समर्थन नहीं ली क्योंकि वो हमेशा “स्वराज” में भरोसा करते थे।

    सन 1903 में वे क्रांतकारी गतिविधियों में शामिल हो गये. अंग्रेजो ने भयभीत होकर सन 1908 में उन्हें और उनके भाई को अलीपुर जेल भेजा. यहाँ उन्हें दिव्य अनुभूति हुई. उन्होंने ”काशवाहिनी” नामक रचना की. जेल से छूटकर अंग्रेजी में ‘कर्मयोगी’ और बंगला भाषा में ‘धर्म’ पत्रिकाओ का संपादन किया. उन्होंने सन 1912 तक सक्रिय राजनीति में भाग लिया. इसके बाद उनकी रूचि गीता, उपनिषद और वेदों में हो गयी.

    भारतीय संस्कृति के बारे में महर्षि अरविन्द ने ” फाउंडेशन ऑफ़ इंडियन कल्चर ” तथा ” ए डिफेंसऑफ़ इंडियन कल्चर ” नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी. उनका काव्य ” सावित्री ” अनमोल धरोहर है. सन 1926 से 1950 तक वे अरविन्द आश्रम में तपस्या और साधना में लींन रहे. यहाँ उन्होंने सभाओ और भाषणों से दूर रहकर मानव कल्याण के लिए चिंतन किया. वर्षो की तपस्या के बाद उनकी अनूठी कृति ” लाइफ डिवाइन ” (दिव्य जीवन) प्रकाशित हुई. इसकी गणना विश्व की महान कृत्यों में की जाती है.

    अरविन्द घोष ने इंग्लैंड में कैम्ब्रिज के किंग्स कॉलेज से भारतीत सिविल सर्विस की शिक्षा प्राप्त की। और भारत वापिस आ कर बारोदा राज्य में महाराजा प्रिंसली के राज्य में उन्होंने कई सिविल सर्विस से संबंधित कार्य किये और बाद में उन्होंने खुद को राजनीती में शामिल किया। ब्रिटिशो कानून के विरुद्ध भारत में लेख लिखने पर उन्हें ब्रिटिश अधिकारियो द्वारा जेल में भी डाला गया। लेकिन बाद में उनके खिलाफ कोई सबूत ना होने की वजह से उन्हें रिहा किया गया। जेल में रहते समय उन्होंने बहोत सी बार रहस्यमय और आध्यात्मिकता का अनुभव किया।

    1905 मे व्हाईसरॉय लॉर्ड कर्झन ने बंगाल का विभाजन किया। पुरे देश मे बंगाल के विभाजन के खिलाफ आंदोलन शुरु हुये। पूरा राष्ट्र इस विभाजन के खिलाफ उठ खडा हुवा। ऐसे समय में अरविन्द घोष जैसे क्रांतीकारक को चैन से बैठना नामुमकीन था। उन्होंने 1906 मे नोकरी का इस्तिफा दिया और सक्रिय राजकारण मे खुद को झोंक दिया। इसी साल अरविन्द घोष ने ‘वंदे मातरम्’ इस साप्ताहिक के सहसंपादन के रूप मे कार्य करना शुरु किया।

    सरकार के अन्याय पर ‘वंदे मातरम्’ मे से उन्होंने जोरदार आलोचना की। ‘वंदे मातरम्’ मे ब्रिटीश के खिलाफ लिखने के वजह से उनके उपर मामला दर्ज किया गया लेकीन वो छुट गये। बंगाल मे ‘आचरण समिती’ क्रांतिकारी संघटना कार्यरत थी. ‘आचरण समिती’ के पाचसो के उपर शाखायें थी। अरविंद घोष इनके भाई बारींद्र्कुमार घोष इस संघटने के प्रमुख थे। अरविंद घोष इनकी सलाह और मार्गदर्शन इस संघटनेको मिलता था। कोलकता के पास ‘मानिकतला’ यहा इस समिती का बम बनाने का केंद्र था।

    देशभक्ति से प्रेरित इस युवा ने जानबूझ कर घुड़सवारी की परीक्षा देने से इनकार कर दिया और राष्ट्र-सेवा करने की ठान ली। इनकी प्रतिभा से बड़ौदा नरेश अत्यधिक प्रभावित थे अत: उन्होंने इन्हें अपनी रियासत में शिक्षा शास्त्री के रूप में नियुक्त कर लिया। बडौदा में ये प्राध्यापक, वाइस प्रिंसिपल, निजी सचिव आदि कार्य योग्यता पूर्वक करते रहे और इस दौरान हजारों छात्रों को चरित्रवान देशभक्त बनाया।

    1896 से 1905 तक उन्होंने बड़ौदा रियासत में राजस्व अधिकारी से लेकर बड़ौदा कालेज के फ्रेंच अध्यापक और उपाचार्य रहने तक रियासत की सेना में क्रान्तिकारियों को प्रशिक्षण भी दिलाया था। हजारों युवकों को उन्होंने क्रान्ति की दीक्षा दी थी वे निजी रुपये-पैसे का हिसाब नहीं रखते थे परन्तु राजस्व विभाग में कार्य करते समय उन्होंने जो विश्व की प्रथम आर्थिक विकास योजना बनायी उसका कार्यान्वयन करके बड़ौदा राज्य देशी रियासतों में अन्यतम बन गया था। महाराजा मुम्बई की वार्षिक औद्योगिक प्रदर्शनी के उद्घाटन हेतु आमन्त्रित किये जाने लगे थे।

    1908 मे खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी इन अनुशीलन समिती के दो युवकोंने किंग्जफोर्ड इस जुलमी जज को मार डालने की योजना बनाई। पर उसमे वो नाकाम रहे। खुदीराम बोस पुलिस के हाथो लगे। उन्हें फासी दी गयी। पुलिस ने अनुशीलन समिती ने सदस्योंको पकड़ना शुरु किया। अरविंद घोष को गिरफ्तार किया गया। प्रसिद्ध अलीपुर बम केस अरविंद घोष के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

    एक वर्ष के लिए अरविन्द अलीपुर सेंट्रल जेल के एकान्त कारावास में एक विचाराधीन कैदी रहे। वह अलीपुर जेल की एक गंदे सेल में थे जब उन्होंने अपने भविष्य के जीवन का सपना देखा जहाँ भगवान ने उन्हें एक दिव्य मिशन पर जाने का आदेश दिया। उन्होंने क़ैद की इस अवधि का उपयोग गीता की शिक्षाओं का गहन अध्ययन और अभ्यास के लिए किया। चित्तरंजन दास ने श्री अरविन्द का बचाव किया और एक यादगार सुनवाई के बाद उन्हें बरी कर दिया गया।

    अपने कारावास के दौरान अरविंद घोष ने योग और ध्यान में अपनी रुचि को विकसित किया। अपनी रिहाई के बाद उन्होंने प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास शुरू कर दिया 1910 में श्री अरविंद घोष कलकत्ता छोड़ पांडिचेरी में बस गए। पांडिचेरी में वह अपने एक दोस्त के घर पर रुके। शुरुआत में वह अपने चार से पांच साथियों के साथ रहे। फिर धीरे धीरे सदस्यों की संख्या में वृद्धि हुई और एक आश्रम की स्थापना हुई ।

राष्ट्रवाद में महर्षि अरविंद का अभिप्राय है <<<

महर्षि अरविन्दो ने राष्ट्र और राष्ट्रीयता की संकल्पना को एक वृहद दृष्टिकोण प्रदान किया। उनके अनुसार राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक बल है जो सदैव विद्यमान रहती है और इसमें किसी प्रकार का क्षरण नहीं होता। अरविन्दो राष्ट्रवाद को ही सच्चा धर्म मानते थे और राजनीतिक स्वतन्त्रता को ईश्वरीय कार्य की संज्ञा देते है।

समाज दर्शन <<<

    समाज दर्शन समाज के अध्ययन द्वारा उसमें अंतर्निहित दिव्यता को समझने और पहचानने का प्रयास है। समाज दार्शनिकों ने प्राय: अपना ध्यान बाह्य तथ्यों, यथा नियमों, संस्थाओं, परम्पराओं, राजनीति और आर्थिक परिस्थितियों आदि पर ही केन्द्रित किया है। उन्होंने उन प्रमुख मनोवैज्ञानिक तथ्यों की अवहेलना की है, जो मनुष्य जैसे भावनात्मक और विचारशील प्राणी के जीवन में नितांत महत्त्वपूर्ण हैं। मनुष्य और समाज का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण अत्यन्त जटिल है। लामप्रेक्त के अनुसार समाज के विकास की मनोवैज्ञानिक स्थितियां ये हैं- प्रतीकात्मक, प्रारुपिक, रूढ़िपरक तथा व्यक्तिपरक।

    समाज का विकास इन स्थितियों के माध्यम से इस प्रकार के मनोवैज्ञानिक वृत का रूप धारण कर लेता है। इस वृत से होकर ही राष्ट्र और सभ्यता को गुज़रना पड़ता है। परन्तु श्री अरविंद के अनुसार विकासक्रम की इस प्रकार की निश्चित व्याख्या और वर्गीकरण वस्तुत: प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। प्रकृति की वक्र गति को सीधी रेखा की भांति नहीं समझाया जा सकता है। लामप्रेक्त का सिद्धांत क्रमबद्ध स्थितियों के निहितार्थ एवं उनके अनिवार्य अनुक्रम के ध्येय के विषय में कुछ भी सूचित नहीं करता।

    परन्तु श्री अरविंद के अनुसार यदि लामप्रेक्त द्वारा विवेचित समाज के विकास की स्थितियों के निहितार्थों का अनुशीलन किया जाए, तो वे ऐतिहासिक विकास के सूक्ष्मतम रहस्यों एवं तथ्यों की ओर संकेत करती है। मानव समाज की आरम्भिक स्थितियों के अध्ययन और अनुशीलन उस मानसिकता को प्रकट करते हैं जो उसकी परम्पराओं, विचारों और संस्थाओं में अप्रकट रूप में विद्यमान रहती हैं।

महर्षि अरविंद ने उत्तरपाड़ा में भाषण दिया <<<

जेल से रिहाई के बाद श्री अरविंद ने कर्मयोगिन और धर्म पत्रिकाओं काअंग्रेजी और बांग्ला में प्रकाशन शुरू किया। जेल कारावास के दौरान ही उन्हें दिब्य आधात्मिक अनुभूति हुई। इसकी पहली अभिव्यक्ति 30 मई 1909 को उत्तरपाड़ा में दिये सार्वजनिक भाषण में प्रकट हुआ। अंतरात्मा की आवाज पर वे पांडिचेरी चले गए।

अरविंद घोष के गुरु <<<

अरबिंद कृष्णधन घोष या श्री अरबिंदो एक महान योगी और गुरु होने के साथ साथ गुरु और दार्शनिक भी थे। ईनका जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता पश्चिम बंगाल में हुआ था।

अरविंद के अनुसार राष्ट्रवाद है <<<

महर्षि अरविन्दो ने राष्ट्र और राष्ट्रीयता की संकल्पना को एक वृहद दृष्टिकोण प्रदान किया। उनके अनुसार राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक बल है जो सदैव विद्यमान रहती है और इसमें किसी प्रकार का क्षरण नहीं होता। अरविन्दो राष्ट्रवाद को ही सच्चा धर्म मानते थे और राजनीतिक स्वतन्त्रता को ईश्वरीय कार्य की संज्ञा देते है।

अरविंद घोष ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया <<<

व्याख्यान = अरविन्द घोष ने 1910 मे सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर आध्यात्मिक चिन्तन की दिशा में कार्य किया और पांडिचेरी में ‘ऑरविले’ नामक आश्रम स्थापित किया।

राष्ट्रवाद में महर्षि अरविंद का अभिप्राय है <<<

अरविंद का विश्वास था कि मानव दैवी शक्ति से समन्वित है और शिक्षा का लक्ष्य इस चेतना शक्ति का विकास करना है। इसीलिए वे मस्तिष्क को ‘छठी ज्ञानेन्द्रिय’ मानते थे। शिक्षा का प्रयोजन इन छ: ज्ञानेन्द्रियों का सदुपयोग करना सिखाना होना चाहिए।

अरविन्द आश्रम की स्थापना <<<

महर्षि अरविंद यानी अरविंद घोष ने 1928 में पुडुचेरी (तत्कालीन पांडिचेरी) में इस आश्रम की स्थापना की थी। वैसे तो महर्षि अरविंद अंग्रेजों के उत्पीड़न से बचने के लिए पांडिचेरी आए थे, लेकिन यहां आने के बाद उन्हें अध्यात्म की शक्ति का आभास हुआ और वह योग की तरफ मुड़ गए। उनका दर्शन योग व आधुनिक विज्ञान का मेल था।

अरविंद घोष ने नारा दिया था <<<

उन्होंने अपने भाषणों तथा ‘वंदे मातरम्’ में प्रकाशित लेखों द्वारा अंग्रेज सरकार की दमन नीति की कड़ी निंदा की थी। अरविंद का नाम 1905 के बंगाल विभाजन के बाद हुए क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ा और 1908-09 में उन पर अलीपुर बमकांड मामले में राजद्रोह का मुकदमा चला जिसके फलस्वरूप अंग्रेज सरकार ने उन्हें जेल की सजा सुना दी।

अरविंद घोष द्वारा प्रारंभ अंग्रेजी साप्ताहिक का नाम था <<<

अरविंदो घोष ने ‘कर्मयोगी’ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक का संपादन किया था। इस अंग्रेजी पत्र का संपादन उन्होंने 1908 क्रांतिकारी गतिविधियों में आरोप में बंद से जेल से छूटने के बाद किया था। अरविंदो घोष एक महान योगी एवं दार्शनिक थे। जिनका जन्म 15 अगस्त 1872 को कोलकाता में हुआ था।

महर्षि अरविन्द का शैक्षिक दर्शन है <<<

अरविंद का विश्वास था कि मानव दैवी शक्ति से समन्वित है और शिक्षा का लक्ष्य इस चेतना शक्ति का विकास करना है। इसीलिए वे मस्तिष्क को ‘छठी ज्ञानेन्द्रिय’ मानते थे। शिक्षा का प्रयोजन इन छ: ज्ञानेन्द्रियों का सदुपयोग करना सिखाना होना चाहिए।

अरविन्द ने भारतीय शिक्षा चिन्तन में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। उन्होंने सर्वप्रथम घोषणा की कि मानव सांसारिक जीवन में भी दैवी शक्ति प्राप्त कर सकता है। वे मानते थे कि मानव भौतिक जीवन व्यतीत करते हुए तथा अन्य मानवों की सेवा करते हुए अपने मानस को अति मानस' तथा स्वयं कोअति मानव’ में परिवर्तित कर सकता है।
अरविन्द ने भारतीय शिक्षा चिन्तन में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। उन्होंने सर्वप्रथम घोषणा की कि मानव सांसारिक जीवन में भी दैवी शक्ति प्राप्त कर सकता है। वे मानते थे कि मानव भौतिक जीवन व्यतीत करते हुए तथा अन्य मानवों की सेवा करते हुए अपने मानस को अति मानस' तथा स्वयं कोअति मानव’ में परिवर्तित कर सकता है।

अरविन्द ने भारतीय शिक्षा चिन्तन में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। उन्होंने सर्वप्रथम घोषणा की कि मानव सांसारिक जीवन में भी दैवी शक्ति प्राप्त कर सकता है। वे मानते थे कि मानव भौतिक जीवन व्यतीत करते हुए तथा अन्य मानवों की सेवा करते हुए अपने मानस को अति मानस' तथा स्वयं कोअति मानव’ में परिवर्तित कर सकता है।

शिक्षा का उद्देश्य <<<

बालक का सर्वांगीण विकास- अरविन्द घोष के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा का सर्वांगीण विकास करना है। ताकि इनका उपयोग वे स्वंय में निहित दैवी सत्य को प्राप्त करने में उपकरण के रूप में कर सकें। शिक्षा छात्रों को स्वंय का समग्र रूप से विकास करने में सहायता प्रदान करती है। वे बालक के शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, आत्मा आदि विभिन्न पक्षों के समन्वित विकास पर बल देते हैं। अरविन्द घोष एसेज ऑन द गीता में लिखते हैं ‘‘बालक की शिक्षा उसकी प्रकृति में जो कुछ सर्वोत्तम, सर्वाधिक शक्तिशाली, सर्वाधिक अन्तरंग और जीवन पूर्ण है, उसको अभिव्यक्त करने वाली होनी चाहिए। मानस की क्रिया और विकास जिस साँचे में ढ़लनी चाहिए, वह उनके अन्तरंग गुण और शक्ति का साँचा है। उसे नई वस्तुएँ अवश्य प्राप्त करनी चाहिए, परन्तु वह उनको सर्वोत्तम रूप से और सबसे अधिक प्राणमय रूप में स्वयं अपने विकास, प्रकार और अन्तरंग शक्ति के आधार पर प्राप्त करेगा।’’

शिक्षण-विधि <<<

यद्यपि अरविन्द ने शिक्षण विधि के बारे में स्पष्ट नीति या कार्ययोजना का विकास नहीं किया पर उनके कार्यों से उनकी शिक्षण विधि के संदर्भ में मूलभूत सिद्धान्तों का विश्लेषण किया जा सकता है।

अरविन्द घोष का यह मानना था कि छात्र को कुछ भी ऐसा नहीं सिखाया नहीं जा सकता जो पहले से उसमें निहित नहीं है। छात्र को सीखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए- शिक्षक का कर्तव्य है कि वह उपयुक्त परिस्थितियों का निर्माण करे। शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में बच्चे की इच्छा एवं रूचि अधिक महत्व रखता है। विद्याथ्री जिस विषय की शिक्षा में रूचि रखता हो उसे उस विषय की शिक्षा देनी चाहिए। साथ ही शिक्षण विधि का चयन छात्र की रूचि के अनुसार होनी चाहिए। शिक्षक को इस तरह से शिक्षण कार्य करना चाहिए कि छात्र पढ़ाये जा रहे पाठ एवं विषय में रूचि ले।

अरविन्द घोष ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चे की शिक्षा वर्णमाला से प्रारम्भ नहीं होनी चाहिए। उसे प्रारम्भ में प्रकृति के विभिन्न रूपों- पेड़- पौधों, सितारों, सरिता, वनस्पतियों एवं अन्य भौतिक पदार्थों का निरीक्षण करने का अवसर देना चाहिए। इससे विद्यार्थियों में निरीक्षण शक्ति, संवेदनशीलता, सहयोग एवं सहअस्तित्व का भाव विकसित होता है। इसके बाद अक्षरों या वर्णों को सिखाना चाहिए। फिर शब्दों का अर्थ बताकर उनका विभिन्न तरीकों से प्रयोग करना सिखाना चाहिए। शब्द प्रयोग द्वारा साहित्यिक क्षमता का विकास होता है।

बालक के सभी शारीरिक तथा मानसिक अंग उसके स्वयं के वश में होने चाहिए, न कि अध्यापक के नियन्त्रण में। बालक की रूचियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप उन्हें कार्य मिलना चाहिए।

अरविन्द आश्रम की सारी शिक्षा-व्यवस्था नि:शुल्क है। विद्याथ्री एक बार अगर प्रवेश पा लेता है तो उसे कोई शुल्क नहीं देना पड़ता है। यह प्राचीन गुरूकुल व्यवस्था के अनुरूप है। अरविन्द घोष विद्यार्थियों में स्वअनुशासन की भावना जगाना चाहते थे। आश्रम का सम्पूर्ण वातावरण आध्यात्मिक है अत: स्वभाविक है कि यहाँ के विद्यार्थियों की चेतना का स्तर ऊँचा हो।

शिक्षण-संस्स्थायें <<<

राजनीति से सन्यास ग्रहण करने के उपरांत 1910 में अरविन्द घोष पाण्डिचेरी आ गये। वे यहीं साधना-रत हो गये। धीरे-धीरे साधकों एवं अरविन्द के अनुगामियों की संख्या बढ़ती गई। 1926 में यहाँ अरविन्द आश्रम की स्थापना की गई। 1940 से साधकों को आश्रम में बच्चों को रखने की अनुमति दे दी गई। बच्चों की आवश्यकता को देखते है अरविन्द घोष ने 1943 में आश्रम विद्यालय की स्थापना की।

महर्षि अरविंद का प्रथम संदेश मिला <<<

महर्षि अरविन्द ने भारतीय शिक्षा चिंतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके अनुसार मानव सांसारिक जीवन में रहकर भी दैवी शक्ति प्राप्त कर सकता है। उनका संदेश ये है कि वास्तविक अनुशासन अपने अंदर होता है। वे कहते है कि बच्चे स्वयं अपने ज्ञान को विकसित कर सकते है।

अरबिंदो घोष के राजनीतिक विचार <<<

निष्क्रिय प्रतिरोध अरबिंदो ने निष्क्रिय प्रतिरोध का विचार आयरलैंड के निष्क्रिय प्रतिरोध से लिया. …
व्यक्तिगत स्वतंत्रता उनके अनुसार किसी भी समाज या देश में तीन प्रकार की स्वतंत्रताओं का होना ज़रूरी है – …
अधिकार …
राष्ट्रवाद …
मानव एकता अथवा विश्व एकता …
राज्य …
समाजवाद …
लोकतंत्र

महर्षि अरविंद घोष, के जीवन की 10 खास बातें <<<

  1. 5 से 21 वर्ष की आयु तक अरविंद की शिक्षा-दीक्षा विदेश में हुई। वैसे तो अरविंद ने अपनी शिक्षा खुलना में पूर्ण की थी, लेकिन उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए वे इंग्लैंड चले गए और कई वर्ष वहां रहने के पश्चात कैंब्रिज विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र की पढ़ाई की। दरअसल, जब अरविंद घोष 5 साल के थे उन्हें दार्जिलिंग के लोरेटो कान्वेंट स्कूल में भेज दिया गया। दो साल के बाद 1879 में अरविंद घोष को उनके भाई के साथ उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया। अरविंद ने अपनी पढाई लंदन के सेंट पॉल से पूरी की। वर्ष 1890 में 18 साल की उम्र में अरविंद को कैंब्रिज में प्रवेश मिल गया।
  2. अपने अंग्रेज समर्थ पिता की इच्छा का पालन करने के लिए, उन्होंने कैम्ब्रिज में रहते हुए आईसीएस के लिए आवेदन भी दिया। उन्होंने 1890 में भारतीय सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की। हालांकि वह घुड़सवारी की एक आवश्यक इम्तेहान में विफल हो गए और इसलिए उन्हें भारत सरकार की सिविल सेवा में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली। आईसीएस अधिकारी बनने के लिए उन्होंने भरपूर कोशिश की पर वे अनुत्तीर्ण हो गए।
  3. स्वदेश लौटने पर उनके ज्ञान तथा विचारों से प्रभावित होकर गायकवाड़ नरेश ने उन्हें बड़ौदा में अपने निजी सचिव के पद पर नियुक्त कर दिया। बाद में बड़ौदा से कोलकाता आने के बाद महर्षि अरविंद आजादी के आंदोलन में उतरे। कोलकाता में उनके भाई बारिन ने उन्हें बाघा जतिन, जतिन बनर्जी और सुरेन्द्रनाथ टैगोर जैसे क्रांतिकारियों से मिलवाया। 1902 में अहमदाबाद के कांग्रेस सत्र में अरविंद बाल गंगा तिलक से मिले और बाल गंगाघर तिलक से प्रभावित होकर वो भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़ गए।
  4. 1905 में व्हाईसरॉय लॉर्ड कर्झन ने बंगाल का विभाजन किया। सन् 1906 में जब बंग-भंग का आंदोलन चल रहा था तो उन्होंने बड़ौदा से कलकत्ता की ओर प्रस्थान कर दिया। इस दौरान उन्होंने 1906 में नौकरी से त्यागपत्र देकर ‘वंदे मातरम्’ साप्ताहिक के सहसंपादन के रूप मे कार्य प्रारंभ किया और सरकार के अन्याय के खिलाफ जोरदार आलोचना की। ‘वंदे मातरम्’ में ब्रिटीश के खिलाफ लिखने के वजह से उनके उपर मामला दर्ज किया गया लेकिन वो छुट गए। बंगाल के बाहर क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ाने के लिए ‘वन्दे मातरम्’ में विदेशी सामानों का बहिष्कार और आक्रामक कार्यवाही सहित स्वतंत्रता पाने के लिए उनके कुछ प्रभवकारी तरीके उल्लिखित हैं। उनके प्रभावकारी लेखन और भाषण ने उनको स्वदेशी, स्वराज और भारत के लोगों के लिए विदेशी सामानों के बहिष्कार के संदेश को फैलाने में मदद किया।
  5. जनता को जागृत करने के लिए अरविंद ने उत्तेजक भाषण दिए। उन्होंने अपने भाषणों तथा ‘वंदे मातरम्’ में प्रकाशित लेखों द्वारा अंग्रेज सरकार की दमन नीति की कड़ी निंदा की थी। अरविंद का नाम 1905 के बंगाल विभाजन के बाद हुए क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ा और 1908-09 में उन पर अलीपुर बमकांड मामले में राजद्रोह का मुकदमा चला जिसके फलस्वरूप अंग्रेज सरकार ने उन्हें जेल की सजा सुना दी। जब सजा के लिए उन्हें अलीपुर जेल में रखा गया तो जेल में अरविंद का जीवन ही बदल गया। महर्षि अरविंद पहले एक क्रांतिकारी नेता थे लेकिन बाद में वे अध्यात्म की ओर मुड़ गए।
  6. वे जेल की कोठरी में ज्यादा से ज्यादा समय साधना और तप में लगाने लगे। वे गीता पढ़ा करते और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना किया करते। ऐसा कहा जाता है कि अरविंद जब अलीपुर जेल में थे, तब उन्हें साधना के दौरान भगवान कृष्ण के दर्शन हुए। इस दिव्य अनुभूति के बाद कृष्ण की प्रेरणा से वे क्रांतिकारी आंदोलन छोड़कर योग और अध्यात्म में रम गए। कृष्णानुभूति के बाद वे ‘अतिमान’ होने की बात करने लगे।
  7. जेल से बाहर आकर वे किसी भी आंदोलन में भाग लेने के इच्छुक नहीं थे। अरविंद गुप्त रूप से 1910 में पांडिचेरी चले गए। वहीं पर रहते हुए अरविंद ने योग द्वारा सिद्धि प्राप्त की और आज के वैज्ञानिकों को बता दिया कि इस जगत को चलाने के लिए एक अन्य जगत और भी है। वहीं पर उन्होंने श्री अरविंद आश्रम ऑरोविले की स्थापना की थी। उन्होंने काशवाहिनी नामक रचना की। जेल से छूटकर अंग्रेजी में कर्मयोगी और बंगला भाषा में धर्म नामक पत्रिकाओं का संपादन किया। उन्होंने सन 1912 तक सक्रिय राजनीति में भाग लिया था।
  8. अरविंद एक महान योगी और दार्शनिक थे। उनका पूरे विश्व में दर्शनशास्त्र पर बहुत प्रभाव रहा है। उन्होंने जहां वेद, उपनिषद आदि ग्रंथों पर टीका लिखी, वहीं योग साधना पर मौलिक ग्रंथ लिखे। खासकर उन्होंने डार्विन जैसे जीव वैज्ञानिकों के सिद्धांत से आगे चेतना के विकास की एक कहानी लिखी और समझाया कि किस तरह धरती पर जीवन का विकास हुआ। वेद और पुराण पर आधारित महर्षि अरविंद के ‘विकासवादी सिद्धांत’ की उनके काल में पूरे यूरोप में धूम रही थी।
  9. उनकी प्रमुख कृतियां लेटर्स ऑन योगा, काव्य कृति सावित्री, योग समन्वय, दिव्य जीवन, फ्यूचर पोयट्री और द मदर हैं। भारतीय संस्कृति के बारे में महर्षि अरविंद ने फाउंडेशन ऑफ़ इंडियन कल्चर तथा ए डिफेंसऑफ़ इंडियन कल्चर नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की। वर्षो की तपस्या के बाद उनकी अनूठी कृति लाइफ डिवाइन (दिव्य जीवन) प्रकाशित हुईस इसकी गणना विश्व की महान कृत्यों में की जाती है।
  10. सन् 1914 में मीरा नामक फ्रांसीसी महिला की पांडिचेरी में अरविंद से पहली बार मुलाकात हुई। जिन्हें बाद में अरविंद ने अपने आश्रम के संचालन का पूरा भार सौंप दिया। अरविंद और उनके सभी अनुयायी उन्हें आदर के साथ ‘मदर’ कहकर पुकारने लगे। सन 1926 से 1950 तक वे अरविंद आश्रम में तपस्या और साधना में लींन रहे। यहां उन्होंने सभाओं और भाषणों से दूर रहकर मानव कल्याण के लिए चिंतन किया। बताया जाता है कि निधन के बाद 4 दिन तक उनके पार्थिव शरीर में दिव्य आभा बने रहने के कारण उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया और अंतत: 9 दिसंबर को उन्हें आश्रम में समाधि दी गई।

महर्षि अरविंद के अनुसार सनातन धर्म की मानव जीवन में भूमिका <<<

सनातन धर्म हमे आदर्श व्यक्ति बनने और दुसरे व्यक्ति को आदर्श व्यक्ति बनने के लिए प्रेरित करने की प्रेरणा देता है। सबको श्रेष्ठ बनाये। सनातन धर्म ख़ुद को जानना इस पर जोर देता है। सनातन धर्म धर्म की रक्षा के लिए जोर देता है।

अरविंद ने राष्ट्रवाद को विशेष नाम दिया <<<

स्वयं भी श्री अरविन्द ने ‘कर्मयोगी’ और ‘धर्म’ जैसे समाचार-पत्रों का प्रकाशन किया। जिनके माध्यम से राष्ट्रवादी चेतना का निर्माण करना और स्वतंत्रता संघर्ष के पाथेय पर आजादी के पथिकों को प्रेरित रखना उनका ध्येय था। श्री अरविन्द के स्वतंत्रता संघर्ष का राजनीतिक अभियान आध्यात्मिकता से सराबोर रहा है।

म्रुत्यु <<<

    बंगाल के बाहर क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ाने के लिये उन्होंने कुछ मदद मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से ली थी। उनके “वन्दे मातरम्” में अरविन्द के द्वारा विदेशी सामानों का बहिष्कार और आक्रामक कार्यवाही सहित स्वतंत्रता पाने के कुछ प्रभवकारी तरीके उल्लिखित हैं। उनके प्रभावकारी लेखन और भाषण ने उनको स्वदेशी, स्वराज और भारत के लोगों के लिये विदेशी सामानों के बहिष्कार के संदेश को फैलाने में मदद किया। वो श्री अरविन्द आश्रम ऑरोविले के संस्थापक थे। फ्रेंच भारत पाँडीचेरी (वर्तमान पुडुचेरी) में 1950 में 5 दिसंबर को उनका निधन हो गया।

नाम : अरविंद कृष्णघन घोष
जन्म : 15 अगस्त 1872 कोलकता (पं. बंगाल)
पिता : कृष्णघन
माता : स्वर्णलता देवी
पत्नी : मृणालिनी (1901)

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